20 December 2005

शब्द प्राणायाम - 56 - 60

बोझ

नेताओं से
लदी,
इक्कीसवीं
सदी!














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दाँती

दिन-रात
झगड़ा,
सास-बहू का
जहाँ चलता है,
कीड़ा
अनाज में
उसी घर में लगता है !














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गुलाल

राधा-कृष्ण के साथ
लक्ष्मी और विष्णु भी
यदि फागुनी पिचकारी के
साथ होते,
होली और दिवाली जैसे
त्यौहार कभी इतने
दूर-दूर नहीं होते !















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बदलाव

चकोर,
जाने क्यों
पागल हो गया है,
चाँद पर उसे आज
आदमी,
दिख गया है !















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उदारता

मग्गे से,
अधिक उदार
कप-बसी को?
माना जायगा,
आने वाला
आखिरी घूँट तक भी
चाय पी जायगा !













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-रमेशकुमार भद्रावले
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